सिहोरा जिला बनने का सपना, सियासी वादों में उलझा – कब मिलेगा हक?

 सिहोरा जिला बनने का सपना, सियासी वादों में उलझा – कब मिलेगा हक? 

 विधायक-सांसद ने किए वादे, पर निभाना भूले – आंदोलनकारियों की नाराजगी चरम पर।

सिहोरा:

सिहोरा को जिला बनाने की मांग 25 वर्षों से चल रही है, लेकिन पिछले चार वर्षों में इसने नया जोर पकड़ा। जनता को उम्मीद थी कि विधानसभा चुनाव से पहले मिले सार्वजनिक आश्वासनों और चुनाव के बाद विधायक, सांसद और पूर्व विधायक द्वारा किए गए वादों के चलते सिहोरा जिला बनने की राह अब आसान हो जाएगी। लेकिन नेताओं की चुप्पी ने इस उम्मीद पर फिर से पानी फेर दिया है।  

सिहोरा के लोगों ने कई बार आंदोलन किए, मांग उठाई, नेताओं को ज्ञापन सौंपे और सरकार तक अपनी बात पहुंचाने की कोशिश की। लेकिन हर बार आश्वासन तो मिला, पर ठोस कार्रवाई नदारद रही। अब सवाल यह उठता है कि क्या यह मांग सिर्फ चुनावी वादों तक सीमित रहेगी, या फिर वास्तव में सिहोरा को उसका हक मिलेगा?  

   वादों की हकीकत – कब, किसने क्या कहा?

सिहोरा को जिला बनाने की मांग को लेकर लक्ष्य जिला सिहोरा आंदोलन समिति ने 1 सितंबर 2024 को एक बड़ी सार्वजनिक बैठक आयोजित की थी। इस बैठक में सिहोरा विधायक संतोष बरकड़े ने वादा किया था कि वे इस मांग को लेकर हरसंभव प्रयास करेंगे और अगले तीन दिनों में सिहोरा वासियों के साथ मुख्यमंत्री से मुलाकात करेंगे। लेकिन छह महीने बीत चुके हैं और विधायक न तो मुख्यमंत्री से मिले, न ही कोई आधिकारिक पत्राचार किया।  

इसी तरह, जबलपुर सांसद आशीष दुबे ने भी 6 नवंबर 2024 को जबलपुर भाजपा कार्यालय में सिहोरा वासियों के साथ बैठक कर उन्हें आश्वस्त किया था कि वे विधायक के साथ मुख्यमंत्री से जल्द ही इस मुद्दे पर चर्चा करेंगे। लेकिन चार महीने गुजर जाने के बाद भी उन्होंने कोई ठोस प्रयास नहीं किया।  

पूर्व विधायक दिलीप दुबे के सर्वदलीय समिति के संयोजक बनने से लोगों को लगा कि अब जिला बनाने की मांग को और मजबूती मिलेगी। ऐसा कयास लगाया गया था कि उनके नेतृत्व में विधायक और सांसद के साथ बेहतर समन्वय बनेगा और सरकार के समक्ष सिहोरा की मांग को प्रभावी रूप से रखा जाएगा। लेकिन अब यह उम्मीद भी धूमिल होती नजर आ रही है। वे पार्टी के प्रत्येक कार्यक्रम में सक्रियता दिखा रहे हैं, लेकिन किसी भी फोरम में सिहोरा जिला बनाने को लेकर कोई पहल करते नहीं दिख रहे।  

   जनता की नाराजगी और नेताओं की चुप्पी:

सिहोरा की जनता अब सवाल कर रही है कि आखिर क्यों उनके जनप्रतिनिधि इस गंभीर मुद्दे पर सक्रिय नहीं हैं? क्या चुनाव जीतने के बाद वादे सिर्फ कागजों तक सीमित रह जाते हैं?  

नेताओं की निष्क्रियता को लेकर जनता के बीच गहरी नाराजगी है। लोगों का कहना है कि जब ये नेता चुनाव के समय वोट मांगने आते हैं, तब तो बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन जब उन वादों को पूरा करने का समय आता है तो चुप्पी साध लेते हैं।  

आंदोलनकारियों का कहना है कि अगर जल्द ही इस मुद्दे पर ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो वे बड़ा आंदोलन करने को मजबूर होंगे।  

                     इनका कहना है:

"विधायक जी से लगातार आग्रह कर रहे हैं। उनके द्वारा सिहोरा जिला मुद्दे पर सकारात्मक बातें कही जाती हैं, लेकिन 'जंगल में मोर नाचा किसने देखा' वाली स्थिति बनी हुई है।"

– विकास दुबे, सदस्य, लक्ष्य जिला सिहोरा आंदोलन समिति  

"विधायक, सांसद और पूर्व विधायक जब मुख्यमंत्री से समय न मिलने की बात कहते हैं तो आश्चर्य होता है। सोशल मीडिया पर आए दिन मुख्यमंत्री जी से उनकी भेंट की खबरें पोस्ट होती हैं, लेकिन जब हमारी बात आती है तो कहते हैं कि समय नहीं मिल रहा।"

– अनिल जैन, सदस्य, लक्ष्य जिला सिहोरा आंदोलन समिति  

                    क्या होगा आगे?

सवाल अब यही है कि क्या सिहोरा को जिला बनाने की मांग को लेकर कोई ठोस कदम उठाया जाएगा, या यह मुद्दा फिर से सिर्फ राजनीतिक बहस और चुनावी घोषणाओं तक ही सीमित रह जाएगा? जनता की उम्मीदें टूट रही हैं, और आंदोलनकारियों के सब्र का बांध भी अब टूटने की कगार पर है। अगर जल्द ही इस पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया गया, तो जनता सड़क पर उतरकर सरकार और नेताओं से अपने हक की लड़ाई लड़ने को मजबूर हो जाएगी।


प्रधान संपादक:अज्जू सोनी,ग्रामीण खबर mp,
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