एक राष्ट्र,एक चुनाव का प्रस्ताव देश के विकास के हित में–पूर्व हाईकोर्ट जज रोहित आर्य।

 एक राष्ट्र,एक चुनाव का प्रस्ताव देश के विकास के हित में–पूर्व हाईकोर्ट जज रोहित आर्य।

कटनी में बुद्धिजीवी सम्मेलन का आयोजन, लोकतंत्र की सशक्तता पर जोर।

कटनी:

बारडोली समिति द्वारा “एक राष्ट्र, एक चुनाव” के संदर्भ में विचार एवं परामर्श विषय पर एक बुद्धिजीवी सम्मेलन का आयोजन होटल ब्रजवासी रॉयल में किया गया। इस सम्मेलन में राज्य समिति के समन्वयक और पूर्व हाईकोर्ट न्यायाधीश रोहित आर्य मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। इस दौरान उन्होंने एक साथ चुनाव कराए जाने के विचार को राष्ट्रीय विकास और लोकतांत्रिक मजबूती के लिए एक अहम कदम बताया।  

जिलाध्यक्ष दीपक सोनी टंडन ने कहा कि “एक राष्ट्र, एक चुनाव” का विचार लोकहित में एक क्रांतिकारी कदम है, जो प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने और चुनावी प्रक्रिया को सुचारु बनाने में सहायक होगा। उन्होंने जनमानस से इस प्रस्ताव को समर्थन देने की अपील की ताकि सुशासन को और मजबूती मिले और जनता को बार-बार होने वाले चुनावों से मुक्ति मिल सके।  

चुनावी प्रक्रिया से विकास कार्यों की गति प्रभावित – विधायक संदीप जायसवाल:

विधायक संदीप जायसवाल ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि बार-बार चुनाव होने से आचार संहिता लागू हो जाती है, जिससे विकास कार्यों की गति प्रभावित होती है। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक तंत्र बार-बार होने वाले चुनावों में उलझा रहता है, जिससे जनहित की योजनाओं के क्रियान्वयन में बाधा उत्पन्न होती है। उन्होंने “एक राष्ट्र, एक चुनाव” को विकास प्रक्रिया को तेज करने वाला महत्वपूर्ण कदम बताया और कहा कि इससे जनता को भी बार-बार मतदान प्रक्रिया से गुजरने की आवश्यकता नहीं होगी।  

पूर्व न्यायाधीश रोहित आर्य ने कहा कि देश में अलग-अलग समय पर चुनाव होने के कारण निर्वाचित मंत्रिपरिषद अधिकतर चुनावी प्रक्रिया में व्यस्त रहती है और इससे विकास कार्यों पर ध्यान देने के लिए समय कम मिलता है। उन्होंने कहा कि “एक देश, एक चुनाव” लागू होने से लोकतंत्र और अधिक मजबूत होगा, आर्थिक बोझ कम होगा और विकास की गति तेज होगी।

2034 तक लागू करने की सिफारिश, पहले जन-जागरूकता जरूरी – रोहित आर्य:

उन्होंने कहा कि यह किसी विशेष दल या राज्य से जुड़ा मुद्दा नहीं है, बल्कि पूरे देश की बेहतरी से संबंधित है। उन्होंने कहा कि चुनावों पर सरकारी खर्च में भारी कमी आएगी, जिससे सरकारी कोष का उपयोग अधिक प्रभावी रूप से विकास कार्यों में किया जा सकेगा। पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की रिपोर्ट में 2034 तक इसे लागू करने की सिफारिश की गई है, लेकिन इससे पहले देश के हर नागरिक को इसके महत्व को समझाना आवश्यक है।  

पिछले वर्ष दिसंबर में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने “एक राष्ट्र, एक चुनाव” को लागू करने हेतु विधेयक को मंजूरी दी थी, जो इसे प्रभावी बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इस पर चर्चा के लिए कई उच्च स्तरीय समितियाँ गठित की गई हैं, जो इस प्रक्रिया को सुगम और प्रभावी बनाने हेतु प्रयासरत हैं।  

प्रबुद्धजनों की उपस्थिति से सम्मेलन को मिली व्यापकता:

कार्यक्रम का संचालन जिला “एक राष्ट्र, एक चुनाव” समिति के संयोजक आशीष गुप्ता बाबा ने किया, जबकि आभार प्रकट समाजसेवी एवं भाजपा जिला महामंत्री सुनील उपाध्याय ने किया।  

इस अवसर पर विधायक संदीप जायसवाल, पूर्व महापौर एवं सीए शशांक श्रीवास्तव, केडीए के पूर्व अध्यक्ष पीतांबर टोपनानी, भाजपा पिछड़ा मोर्चा के उपाध्यक्ष सुरेश सोनी,एक राष्ट्र-एक चुनाव समिति के संयोजक आशीष गुप्ता बाबा, सहसंयोजक दीपक तिवारी सहित अधिवक्ता, चिकित्सक, जनप्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, स्वयंसेवी संगठन, सहकारिता संगठन, नगरीय निकाय, महाविद्यालय के शिक्षक, छात्र एवं व्यापारिक प्रतिनिधि उपस्थित रहे।  

एक साथ चुनाव से प्रशासनिक दक्षता और सुशासन को मिलेगा बल:

सम्मेलन में यह निष्कर्ष निकला कि “एक राष्ट्र, एक चुनाव” की प्रक्रिया को लागू करने से पहले व्यापक जनजागरण अभियान की जरूरत है। इससे आम नागरिक इस सुधार के दीर्घकालिक लाभों को समझ सकेंगे और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकेंगे। विशेषज्ञों ने कहा कि यह प्रणाली केवल चुनावी प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए नहीं, बल्कि देश में सुशासन को और अधिक प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है।  

विशेषज्ञों का मत था कि वर्तमान व्यवस्था में हर साल किसी न किसी राज्य में चुनाव चलते रहते हैं, जिससे सरकार की नीतियाँ लागू करने की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इसके अलावा, सुरक्षा बलों और चुनाव आयोग पर भी अतिरिक्त भार पड़ता है। अगर पूरे देश में एक साथ चुनाव होंगे तो सरकारी खर्च और प्रशासनिक बोझ दोनों कम होंगे और सरकार अपने पूरे कार्यकाल में विकास कार्यों पर ध्यान केंद्रित कर सकेगी।  

      जनजागरण अभियान की आवश्यकता:

सम्मेलन में यह निर्णय लिया गया कि इस मुहिम को जन-जन तक पहुँचाने के लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाया जाएगा। इसके अंतर्गत विभिन्न समाजसेवी संगठनों, शैक्षणिक संस्थानों, व्यापारिक संगठनों और युवा संगठनों को भी जोड़ा जाएगा ताकि इस महत्वपूर्ण सुधार को राष्ट्रीय स्तर पर लागू करने में समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जा सके।  

“एक राष्ट्र, एक चुनाव” पर चर्चा अब राष्ट्रीय स्तर पर जोरों पर है। इसके समर्थक इसे देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए एक क्रांतिकारी सुधार मानते हैं, जबकि इसके विरोधी इसे व्यवहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण बताते हैं। हालांकि, सम्मेलन में भाग लेने वाले विशेषज्ञों और बुद्धिजीवियों का मत था कि यदि इसे सही योजना और निष्पक्ष दृष्टिकोण के साथ लागू किया जाए, तो यह देश के राजनीतिक और प्रशासनिक परिदृश्य को एक नई दिशा प्रदान कर सकता है।  

कार्यक्रम में भाग लेने वाले गणमान्य व्यक्तियों ने इस विषय पर गहन मंथन किया और निष्कर्ष निकाला कि यह प्रस्ताव देश के विकास के हित में है। इसके सफल क्रियान्वयन के लिए सरकार, प्रशासन, राजनीतिक दलों और जनता को मिलकर कार्य करना होगा ताकि लोकतंत्र को और अधिक सशक्त बनाया जा सके।


प्रधान संपादक:अज्जू सोनी, ग्रामीण खबर mp,
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